🕉️ सुप्रभात
घट अनित्य है; नाश हो जाता है यह प्रत्यक्ष है। पृथिवी अनित्य कणोंसे बनी है, अतः घटके समान उसके नाशका अनुमान होता है। ऐसे हो जल, तेज, वायुके नाशका अनुमान होता है। पृथिवी के उपसान से आकाशका नाशवान होना शास्त्रसे सिद्ध है। क्योंकि मनसे आकाशकी सिद्धि होती है; मन में आकाशकी वासना है; स्वप्न में हम उसे बना लेते हैं, जाग्रत में वह मिट जाता है। तो मनसे आकाशका पता चलता है; आकाश मन-सापेक्ष है।
प्रकृतिको अनित्यता स्वसं वेद्य है। द्रष्टा प्रकृतिको लीन होते और प्रकट होता देखता है। परन्तु ‘स्व’ को नित्यता स्वसं वेद्य नहीं है, वह अनुभव-स्वरूप है।
हरिओम तत्सत
English Translation:
All forms are impermanent and subject to destruction. Even the elements and space are dependent on the mind. Nature is ever-changing, but the Self is eternal and realized through direct experience.